ये सुबह कब होगी यार
अंधेरे में अपनी परछाई से बातें करता हूँ
बंद कमरे में अपनी जग हँसाई से छुपा करता हूँ
इसी कशमकश में हूँ की जिंदगी जीने का नया रूप दिखा रही
बंद कमरे में अपनी जग हँसाई से छुपा करता हूँ
इसी कशमकश में हूँ की जिंदगी जीने का नया रूप दिखा रही
अलबत्ता वो मुझसे रूठ कर जा रही है
गाड़ी अपनी बदती रही, कारवा घटता रहा
दिनभर रोया रात भर जगता रहा
आंसुयो से दर्द धोने की कोशिश में
रोया में बहुत दर्द फ़िर भी न गया
आंसुयो से दर्द धोने की कोशिश में
रोया में बहुत दर्द फ़िर भी न गया
हार के और जीत के चलते रहे सिलसिले
दिल में बहुत कुछ था पर किस्से कहे ये गिले
मौत को करीब से देखा टू मुझे यूँ लगा कि
जिंदगी जीने के हमे दिन बहुत कम मिले
हँसते हुए चेहरे को अमावस की रात खा गई
न चाह कर भी अपनों से बिछड़ने की घड़ी क्यों करीब आ गई
AJ...
अंकित जैन